जब भी मेरा
मन विचलित होता है , मेरी कोशिश रहती है कुछ लिखने की , और मैं फिर वही हँसमुख, शांत
हो जाता हूँ। आज अचानक ही मन में आया क्यों
न rapidfire poetry की जाय। अब तक मैंने जितनी भी poetry की है वो काफी सोच समझ कर
की है। पर यह ठीक वैसे ही है जैसे गायक एक
ही साँस में गीत गाते है , आशा है आपको अच्छी लगेगी। थीम है 'ईर्ष्या' । जहाँ तक मैंने देखा है 'ईर्ष्या
या जलन ' मनुष्य की सबसे स्वाभाविक प्रवृतियों
में एक है। कुछ लफ्ज़ ईर्ष्या पर भी
दूसरे का सुख देख कर ईर्ष्या होती है
लगता है मेरी ही किस्मत खोटी है
पर अपनी चाह अपनी मंज़िलें ही मुझे साफ नहीं
दूसरों सी जिंदगी पाने को, क्या दूसरों की तरह नहीं होना होगा मुझे भी
मेरा जीवन , मेरा संघर्ष सब मेरा अपना है
मेरे जैसा जीवन पाना भी तो कईओ का सपना है
बस यहीं पर हम सभी सभी हार जाते हैं
दुनिया में तरह तरह के सिकंदर तो बार बार आते हैं
आते हैं जाते हैं , न जाने कितनों को दुःखी कर जाते हैं
मेरा जीवन भी उसी विजेता जैसा हो
इसी
उधेड़ बुन में बहुत लोग जीना भूल जाते हैं
मज़ा तो तब आता है ,
जब अपने जैसे साधारण लोगो को देख कर भी मन ललचाता है
उनमें कुछ अलग बात है यह बताता है
जबकि अलग सिर्फ इतना है कि वो अलग हैं
तभी हमें लगता है उनके पास सब है
ठीक है , आदर्शों के पीछे भागो
पर
जो है उसको तो
पूरा जिओ अभागों
एक स्वप्निल जीवन एक ही तरह जिया जाए
ऐसा तो मुमकिन नहीं
जितने अनुभव हैं , संभव हैं उतनी तरह की ज़िन्दगी भी
क्यों न होनी जीवनधारा स्वतंत्र और आज़ाद बहे
क्या ईर्ष्या , क्या द्वेष , क्या अपेक्षाएं इनसे बच के रहे
कई बार तो ऐसा होता है , जो जितना प्यारा हो उतना ही दुःख देता है
वह हमारी ही सोच अनुसार चले मूल कारण यही होता है
तीन वक़्त का खाना , सर ऊपर छत और डर से दूर मन
अगर इतना कुछ आज है तो फिर क्यों सोचे अविरल
इच्छाओं की सीमा नहीं , ये तो बढे और बदले पल पल
ऊपर से एक से बढ़कर एक महानुभाव सामने आते हैं
उनके कारनामें देख कर , हँसे या चिंतन करें विचलित हो जाते हैं
कोई ऐसा मन्त्र ढूंढें , अपने ही अपने में मगन रहूं
आदर्श जिंदगी 'वो भी मेरी कल्पना की ' की चाह में न हरदम रहूं
खुश होने का तो एक ही कारन काफी है
दुखी
होने के लिए तो
पूरी दुनिया भी कम पड़
जाती है
सच में , इस बात में बड़ा दम है
जो अपने मन पर काबू पाए , वो न किसी से कम है
जीवन जैसे चलाता रहे , चलते रहो
ज्यादा विपरीत जाने की कोशिश न करो
क्योंकि नदी को आखिर बहना ही है
सागर तक पहुंचना ही है
पहाड़ो की जवानी से , सागर के बुढ़ापे तक
वह बहती है , इसीलिए पूजी जाती है
करोड़ों को जीवन अमृत पहुंचाती है
अगर अपने धर्म - प्रकृति से अगर वह हट जाये
तो फिर नदी क्यों कहलाये
तो महानुभाव, जैसा जीवन आये जी लो
खूब मजे लूटो वर्त्तमान के , कुछ भविष्य के सपने लो
पर भूत -भविष्य में इतना भी खोना नहीं
की अभी मैं कहाँ हूँ , इसका ठिकाना नहीं
बड़े बड़े राजों से लेकर फ़क़ीर तक
कोई
नहीं गया कुछ लेकर
सुनने में ये बात बेवकूफी है लगती
पर 16 आने सच है, झुठला सकते नहीं
एक साधारण सी जिंदगी भी बढ़िया जी जा सकती है
क्या असाधारण है , ये भी हमारी अपनी सोच की कृति है
आनंदमय रहो , क्यों इतना तोल, मोल-भाव
खुल
के जिओ यही है अपना प्राकृतिक
स्वभाव
----------------------------प्रिंस कादयान
