Tuesday, August 11, 2020

Quite a significant heartaches and disappointments in our life are a result of people, close or not-so-close, behaving in a different way than they should. The human tendency to change others the way what they want world to be. I think this tendency stems from the basic human drive to be close to others. More their values are in harmony with our basic values, more their soul is like us, closer we feel to them. But just like so many things in life, paradoxically, if we push someone to change, it creates frictions rather than love. What is the way out? I have a written a Hindi poem to showcase the way I found.

सोच चली ही जाती है उस ओर

जब मुड़ के मैं देखता हूँ मेरे दोस्त कितना अधूरापन है जिंदगी में पूरा जीना चाहा मैंने हर गिनती में सोचा कि दुनिया बदल डालूं मैं क्योंकि यह अभी तक पूरी नहीं है पर हैरानगी तो तब हुई लगा जबकि हर शख्शियत है सोई अपनी कमियों का सिरहाना बना सर तले और देख रही बस अपनी ख़ुदपसंदगी के सपने कोशिश की कई बार उन्हें जगाने की इंतहा हो गयी इसीमे खुद को भूल जाने की पर हर बार हक़ीकत को एक ही पाया दूसरों को जगाने का बीड़ा मैंने ही क्यों उठाया ? शायद मेरा भी यह एक सपना ही है ! शायद उनका प्रतिरोध भी एक आईना ही है अब तो मुझे खुद को ही जगाना होगा दूसरे निराश करते रहेंगे, स्वयं पर ध्यान लाना होगा बात भी तो है छोटी सी, मैं मान जाऊं जिनपे बस नहीं , उन्हें बदलने में क्यों समय गवाऊं ? समय सीमित है , और मेरी ऊर्जा भी यथार्थ अपूर्ण था, है और रहेगा भी क्यों न ये मूल्यांकन खुद तक ही रखूं सीमित खुद को ही बदलूँ , खुद की समझूँ कीमत शायद बढ़ेगा तो , इससे ही बढ़े प्रभाव और कुछ नहीं तो , होगा कुछ और दुःख का अभाव

No comments:

Post a Comment