Friday, September 18, 2020

 अगर कोई ज़बान जज़्बातो की ज़ुबान तो वह है उर्दू ज़बान। उर्दू साहित्य की आवाज़ सीधा दिल से दिल में जाती है। पर मैंने एक खास बात देखी है उर्दू संसार में - इश्क़ का बोलबाला -भले ही वो माशूक के लिए हो या ख़ुदा के लिए ! मेरे जानने वाले उर्दू शाइरों में मुझे फैज़ अहमद फैज़ ही ऐसे दिखे जो कुछ बातें इश्क़ से बाहिर भी करते हैं। जैसे कि उनकी नज़्म - 'हम देखेंगे', या 'बोल की लब आज़ाद हैं तेरे ' - थोड़ा इंकलाबी सुरूर !पर फैज़ ने भी इश्क़बाज़ी को खूब अपनी कृतियों  में इस्तेमाल किया है जैसे - 'मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग'। कई बार तो आलम ये होता है कि उर्दू शायरी का नाम लेते ही 'सस्ती बीमार आशिकी ' की तस्वीर तस्सव्वुर होती है। मेरी दिली चाह है की मैं उर्दू में ऐसा काम करूँ जो आज के ज़माने से ताल्लुक रखती हो और कुछ नए पहलुओं को भी छुए ।  बस इसी कड़ी में यह कृति - थीम थोड़ी ऐसी है - 'जब आप किसी नए कोशिश पर निकलते है तो खुद को तैयार कैसे करते हैं !'


वक़्त की तासीर को इतना समझना है मुझे 

कि घडी की तहरीक का अंदाज़ बदल जायेगा 

यूँ तो तुम्हारी आजमाइशों का दौर पुराना है 

पर इस बार तीर तरकश से निकल जायेगा 

यूँ तो मंज़र खूब डरावने भेजे तुमने

पर अब ख़ौफ़ का साया दिल से निकल जायेगा 

यूँ तो हर बार रिवायतों से मात खाता रहा मैं 

पर अब ज़माने का दस्तूर पता चल जायेगा 

यूँ तो ज़ज़्बा ही रहा है अब तक  हमसफ़र मेरा 

पर अब अम्लियत से भी वाक़िफ़ हो जाऊंगा 

कुछ ऐसी तमन्ना करके निकले है सरफ़रोश घर से 

की तूफां साहिल से खुद ही किनारा करके निकल जायेगा 



अभी तो यह शुरुआत है , धीरे धीरे उर्दू लफ्ज़ो को मैं सीख रहा हूँ और इस कड़ी को समय मिलते ही आगे बढ़ाऊंगा! 


ऊपर इस्तेमाल किये गए कुछ मुश्किल  लफ़्ज़ों के मायने इस तरह हैं। तासीर - प्रकृति /nature , तहरीक- चाल /movement , मंज़र -situation ,रिवायत -tradition ,अम्लियत - व्यावाहरिक /practical ...............................................................प्रिंस




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